कभी-कभी सफ़र करना कितना खूबसूरत लगता है। ख़ासकर तब जब सफ़र के दौरान आप अपने ख़्यालो और किताबों में न खोकर अपने आस-पास होने वाले वाक़यो पर ध्यान देते है। मैं आपसे अपने आज के सफ़र में हुए ऐसे ही कुछ रोचक वाक़यो के बारे में बताने वाली हूँ।
बुसस्टॉप पर बस रुकने पर मैं और मेरी दोस्त दोनों ही बस में चढ़े। बस में ही चढ़ते ही हमने देखा कि हमारे बैठने के लिये बस में जगह नही थी महिला सीट पर भी ज्यादातर पुरुष जाति ही विराजमान थी। हमने मन में सोचा कि आज सीट नही मिलेगी। तभी एक सज्जन पुरुष अपनी जगह से उठ गए और हमारी दोस्त से बैठने को कहा। उनकी देखादेखी एक और लड़का अपनी जगह से उठ गया और मुझे बैठने को कहा। हम दोनों ही हैरान थे क्योंकि आमतौर पर ऐसा नही होता खासकर तब एक लड़का उठ जाए जब कि एक लड़की खड़ी है सिर्फ इसलिए।
बस के आगे बढ़ते ही हमने मेट्रो के ढीले-ढाले विकास को देखा। आगे जाकर एक जगह बस रुकी और टिकट चेकिंग शुरू हुई। एक बुजुर्ग औरत थोड़ी देर पहले चढ़ी थी और उसके पास टिकट नही था जिसके कारण उसे काफी डांट पड़ी। बस हमें हमारी मंज़िल पे छोड़कर आगे बढ़ गयी। ऐसे ही किसी आम से दिन के सफ़र से आप भी हमे रूबरू करवाये। आगे ऐसे ही किसी सफ़र में फिर से मुलाक़ात होगी। तब तक लिये खुदाहाफिज़।
बुसस्टॉप पर बस रुकने पर मैं और मेरी दोस्त दोनों ही बस में चढ़े। बस में ही चढ़ते ही हमने देखा कि हमारे बैठने के लिये बस में जगह नही थी महिला सीट पर भी ज्यादातर पुरुष जाति ही विराजमान थी। हमने मन में सोचा कि आज सीट नही मिलेगी। तभी एक सज्जन पुरुष अपनी जगह से उठ गए और हमारी दोस्त से बैठने को कहा। उनकी देखादेखी एक और लड़का अपनी जगह से उठ गया और मुझे बैठने को कहा। हम दोनों ही हैरान थे क्योंकि आमतौर पर ऐसा नही होता खासकर तब एक लड़का उठ जाए जब कि एक लड़की खड़ी है सिर्फ इसलिए।
बस के आगे बढ़ते ही हमने मेट्रो के ढीले-ढाले विकास को देखा। आगे जाकर एक जगह बस रुकी और टिकट चेकिंग शुरू हुई। एक बुजुर्ग औरत थोड़ी देर पहले चढ़ी थी और उसके पास टिकट नही था जिसके कारण उसे काफी डांट पड़ी। बस हमें हमारी मंज़िल पे छोड़कर आगे बढ़ गयी। ऐसे ही किसी आम से दिन के सफ़र से आप भी हमे रूबरू करवाये। आगे ऐसे ही किसी सफ़र में फिर से मुलाक़ात होगी। तब तक लिये खुदाहाफिज़।