Saturday, 5 August 2017

मेरा ख़त तुम्हारे लिए....

माई डियरेस्ट लेटर, गुड मॉर्निंग!उम्मीद करती हूँ कि ठीक ही होगी... और गुड मॉर्निंग इसलिए कि ये ख़त हम सुबह के करीब ग्यारह बजे लिख रहे है। अब तुम सोच रही होगी कि ये ख़त हमे लिखने की ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी तो सुनो मेरी हमनवां दोस्त वो इसलिए कि हमने सोचा आज के इस सोशल मीडिया के ज़माने में ज़रा गुज़रे ज़माने को याद किया जाये क्योंकि वो ज़माना तुम्हारे लिए सुनहरा दौर हुआ करता था। आजकल तो तुम भी सोचते होगे कि "इस मुए टेलीफोन ने तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी" और वही अब इस सोशल मीडिया ने आग में घी का आम किया और तो और इस टेक्स्ट मैसेजिंग ने तो तुम्हे कोमा में पंहुचा दिया। च्च्चच बेचारे तुम... तो बस हमने सोचा आज फ्रेंडशिप डे के मौके पे सब अपने किसी खास को याद कर रहे है तो क्यों न हम तुम्हे याद करले। क्योंकि तुम्हे तो कोई अब बमुश्किल ही याद करता है..हाँ कभी-कभी कुछ बड़े सेलिब्रिटी ज़रूर याद कर लेते है ताकि तुम्हारे ज़रिये उन्हें भी थोड़ी पब्लिकसिटी मिल जाए। क्योंकि सोशल मीडिया के ज़माने में वक़्त निकाल कर तुम्हे लिखे जाना ही बहुत बड़ी बात है। लेकिन सच कहे तो तुम हमे बहुत पसन्द हो और कही न कही बहुत से लोगो की ज़िन्दगी में तुम्हारी बहुत इम्पोर्टेंस है। क्योंकि सोशल मीडिया के ज़रिये रोज़ बात तो हो जाती है लेकिन बावजूद इसके जब किसी से जो बहुत खास हो और कई सालो तक उससे राब्ता न रहे । एक दिन यू ही अपनी बालकनी में खड़े उसे ही याद कर रहे हो और दरवाज़े पर पोस्टमैन उसका ख़त दे जाये उस वक़्त तुम्हारे ऊपर लिखा एक एक हर्फ़ उस इंसान के लिए क्या मायने रखता है ये तुम अच्छी तरह समझ सकते हो। एक बात तो सच है कि एक तरफ जहा सोशल नेटवर्क ने हमे एक साथ जोड़ा तो ज़रूर है लेकिन इमोशन्स से खाली कर दिया है जिनकी जगह लेली है स्माइलीज़ ने और वही जिनके पास आज भी किसी अपने के पुराने ख़त रखे हुए है यक़ीनन उन्होंने सम्भाल कर उन्हें रखा होगा। बेशक आजकल लोग तुम्हे कोई वैल्यू नही देते मगर जिन लोगो के पास तुम हो उनके लिये उनका रिश्ता हो तुम उनके जज़्बात हो तुम उनके लिए बेहद ख़ास हो तुम। आई होप कोई तुम पर ख़ूबसुरत हर्फ़ लिखकर अपने किसी ख़ास को आज ज़रूर दे ताकि उसे स्पेशल फील हो क्योंकि कहे गए अल्फाज़ो से ज़्यादा लिखे हुए हर्फ़ ज़्यादा खूबसूरत लगते है। एक अलग अलग ही एहसास होता है ख़त पढ़ने का।पता है कुछ पुरानी किताबो में से ढूंढ कर एक शेर चुरा लायी हु तुम्हारे लिये... "तेरे खुश्बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे.. वो ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ.." इसी के साथ लेती हूँ अलविदा यूँ ही किसी रोज़ फिर मिलूंगी। आई विश लोगो की ज़िन्दगी में तुम्हारी हमेशा एक ख़ास जगह रहें। गुड बाय। तुम्हारी दोस्त सोशल मीडिया

Tuesday, 18 July 2017

शिकायत..

"इस घर में तो मेरी कोई कद्र ही नहीं है। जब देखो सब हुक्म चलाते रहते है। मैं मर खप भी जाऊ तो किसी को कोई परवाह नहीं।" बगल की शर्मा आँटी अपने ससुराल वालो की किसी बात पे नाराज़ अपनी भड़ास निकाल रही थी। उन्हें शिकायत थी अपने पति से क़ि वो एक-एक पैसे का उनसे हिसाब करते थे और शिकायत थी अपने बच्चों से कि उनके नखरे भी खाने-पीने से लेकर पहनने ओढ़ने तक कम ना थे ऊपर से सास-ससुर अलग अलाप करते थे।

मैंने सोचा कि शर्मा आंटी का भरा पूरा परिवार है। सब अच्छे से चल रहा है फिर भी इन्हें अपनी ज़िन्दगी से इतनी शिकायत..............न क़ाबिल-ए-यक़ीन है।
जो इंसान गरीब होता है उसे तो खैर शिकायते होती है अपनी ज़िन्दगी से पर जो सफलता के अर्श पर होता है उसे भी शिकायत होती है के उसने अपनी ज़िन्दगी गरीबी में गुज़ारी या अपने लिए अपनी ही ज़िन्दगी को न जी पाया।

अभी दो दिन पहले कि ही तो बात थी। मेहता अंकल अपने एक ख़ास दोस्त चौहान अंकल को बड़े अफ़सोस से बता रहे थे, "हमारे ज़माने तो किसी लड़की को नज़र उठा के देखना गुनाह होता था जब तक हम उस लड़की के इश्क़ में मुब्तिला होते तब तक उसकी शादी हो जाती और आजकल का अफ़ला तूनी इश्क़ भगवन ही बचाये।" बात तो थीक ही की थी मेहता अंकल ने हमारी जनरेशन का प्यार एकदम 'मैगी' जैसा है, अभी देखा, दो मिनट में बात हुई एक घंटे में प्यार हुआ और ठीक दो दिन बाद ब्रेकअप ट्रामा..........।

जिसकी शिकायत दोनों हि पछ एक दूसरे को दोष देते हुए अपने दोस्तों में बताते है। लेकिन अगर किसी का प्यार एक साल चल गया तब तो समझो वो लवगुरु ही बन गया पर उसमे भी शिकायते और शिकवे करते रहना।

एक छोटा बच्चा अपने छोटे भाई-बहनो के साथ सड़क पर भीख मांगते हुए दीखता है पर एक स्कूल के सामने जाकर थोड़ी देर के लिए रुकता है। उस वक़्त उस बच्चे की मासूम सी आँखों के मासूम से सपने पानी बन कर बह जाते है और आसमान की तरफ देखकर शायद वो भगवान् से यही शिकायत करता है कि "वो स्कूल क्यों नहीं जा पाया।"

जब लोगो को उनकी मनचाही चीज नहीं मिलती तो लोग बॉलीवुड के गानो से खुद को तसल्ली देते है कि "शिकवा नहीं किसी से किसी से गिला नहीं, नसीब में नहीं था जो हमको मिला नहीं।" जो मिला नहीं उसकी शिकवा शिकायत करना फ़िज़ूल है इसीलिए उसके पीछे निराश होने से बेहतर है कि खुद को बेहतर बनाया जाए। शिकायतों को भूलकर आने वाली ज़िन्दगी का इस्तेकबाल किया जाए। आखिर में चलते-चलते एक मशहूर शायर की शायरी हो जाए.......

"कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,
कही जमीं तो कही आसमां नहीं मिलता।"

Monday, 22 May 2017

लखनऊ की तहज़ीब...

आदाब! ख़ैरियत?? हमारी पूछे तो हम बेशक ख़ुदा के शुक्र से बेहतर है। अजी आप क्या सोचने लगे? परेशान न हो हम यहां आपके या अपने हाल-चाल से और ज़्यादा तआरुफ़ नही करेंगे। बस हम तो ज़रा ये जताने की कोशिश कर रहे है कि हम लखनऊ के बाशिंदे है जहां की ज़बान आपका दिल यूं ही चुरा ले जाये। हिंदुस्तान में जब कभी नफ़ासत और नज़ाकत की बात आती है तब सबसे पहले लखनऊ का नाम लिया जाता है। जहां की जबान में डैरीमिल्क जैसी मिठास है, जहां के महलों में कथक का हुनर परवान चढ़ा, जहां संगीत ने कई अलाप सीखें। जहां के अदब पर पुरे देश को नाज़ है फिर चाहे वो 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' बेग़म अख़्तर हो या शायरी के बादशाह 'मीर तक़ी मीर' साहब। एक बात बहुत मशहूर है हिंदुस्तान में बनारस की सुबह और शाम-ए-अवध से ज़्यादा खूबसूरत कुछ नही। अगर आप कभी खुशकिस्मती से कभी लखनऊ आये और यहाँ का लज़ीज़ क़बाब न चखे...चिकन न ख़रीदे...और तो और यहाँ का इमामबाड़ा न देखा समझिये आप ने लखनऊ को कभी जाना ही नहीं।वैसे तो लखनऊ की कई ख़ास बाते है जो आपको पसन्द आएंगी जैसे बागो का शहर हो या हवाईजहाज नुमा महल या बारादरी या कि केसर में रचा-बसा कैसरबाग या कि हो पुराने लखनऊ में चौक की गलियां या गोमती किनारे का कुड़िया घाट का पुरसुकून मन्ज़र। लखनऊ अपने नाम की ही तरह लाजवाब है। लखनऊ किसी मज़हबी रंग में नही रंगा यहां की जितनी मशहूर प्रकाश की कुल्फ़ी है उतने ही लाजवाब टुंडे के कबाब है। शामीनाशाह की दरगाह हो या कि हो मनकामेश्वरम् मन्दिर। शहर की इन भीड़भाड़ वाली जगहों में भी आपको एक अलग ही सुकून मिलेगा। इसके अलावा दो ऐसी ख़ास बाते हैं जो लखनऊ को दूसरे शहरों से बेहतर और खूबसुरत बनाती हैं। पहला यहाँ त्यौहार की तरह मनाया जाने वाला जेठ का बड़ा मंगल। बड़े मंगल का जश्न पूरे देश में सिर्फ लखनऊ में मनाया जाता है। बड़ा मंगल मनाये जाने के पीछे दो कहानियां प्रचलित है पहला कारण है कि लखनऊ के शाही ख़ानदान में किसी के बीमार होने पर मन्नत मांगी गयी और हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना करके पूजा की गयी जिससे वो बीमार ठीक हो गया। दूसरी कहानी ये है कि एक बार केसर के व्यापारियोंका समूह लखनऊ में था लेकिन उनका केसर महंगा होने की वजह से किसी ने नही लिया वे दुखी हो गए। जब ये बात नवाब साहब को पता चली तो उन्होंने उन व्यापारियों का सारा केसर ख़रीद लिया।नवाब साहब ने सोचा कि इतनी सारी केसर का क्या होगा तब उन्होंने केसर बाग़ के सरे दरवाज़े केसर से रंगवा दिए थे इसी वजह से केसरबाग़ को केसरबाग़ कहा जाता है।और उन व्यापारियों ने खुश होकर इस दिन हनुमान मंदिर के बाहर प्याऊ लगवाया था तभी से जेठ के मंगलवार को हनुमान जी की पूजा के बाद भंडारे का आयोजन होता है। कारण चाहे जो भी हो लेकिन जेठ की इस तपती गर्मी में लखनऊ का कोई भी शख़्स भूखे-प्यासे नही सोता। इसी तरह से दूसरी ख़ास बात ये है कि शिया मुसलमानों द्वारा मनाया जाने वाला मुहर्रम का त्योहार भी कुछ इस तरह का है। इन दस दिनों में जो शख़्स मजलिस सुनने जाता है उनके खाने-पीने का सारा इंतेज़ाम वही मजलिस में रखा जाता है । लखनऊ के लिए ये कहना ग़लत नही होगा कि पहली मुलाक़ात में आपको वो लखनवी अंदाज़ ज़रूर मिल जायेगा। लखनऊ वालो की बात ही सबसे ख़ास है अब नवाब जो ठहरे। उनकी नज़ाकत नफ़ासत की तो दुनिया दीवानी है पर आजकल लोग मोर्डन बनने के चक्कर में अपनी तहज़ीब भूलते जा रहे है तू-तकार से बात करना तक फैशन हो गया है और आप-जनाब तो जहन से निकलता ही जा रहा है। आगे बढ़िये मॉर्डन बनिए मगर अपनी विरासत न भूलिये। वरना वक़्त से पहले ही दुनिया लखनऊ को सिर्फ यूपी की राजधानी के बारे में जानेगी उसकी नज़ाक़त और नफासत के बारे में नही वक़्त हो तो इस पर गौर कीजियेगा।फिर किसी रोज़ मिलेंगे तब तक ले लिए इजाज़त दीजिये।खुदा हाफ़िज़।