Monday, 22 May 2017
लखनऊ की तहज़ीब...
आदाब! ख़ैरियत?? हमारी पूछे तो हम बेशक ख़ुदा के शुक्र से बेहतर है। अजी आप क्या सोचने लगे? परेशान न हो हम यहां आपके या अपने हाल-चाल से और ज़्यादा तआरुफ़ नही करेंगे। बस हम तो ज़रा ये जताने की कोशिश कर रहे है कि हम लखनऊ के बाशिंदे है जहां की ज़बान आपका दिल यूं ही चुरा ले जाये।
हिंदुस्तान में जब कभी नफ़ासत और नज़ाकत की बात आती है तब सबसे पहले लखनऊ का नाम लिया जाता है। जहां की जबान में डैरीमिल्क जैसी मिठास है, जहां के महलों में कथक का हुनर परवान चढ़ा, जहां संगीत ने कई अलाप सीखें। जहां के अदब पर पुरे देश को नाज़ है फिर चाहे वो 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' बेग़म अख़्तर हो या शायरी के बादशाह 'मीर तक़ी मीर' साहब। एक बात बहुत मशहूर है हिंदुस्तान में बनारस की सुबह और शाम-ए-अवध से ज़्यादा खूबसूरत कुछ नही।
अगर आप कभी खुशकिस्मती से कभी लखनऊ आये और यहाँ का लज़ीज़ क़बाब न चखे...चिकन न ख़रीदे...और तो और यहाँ का इमामबाड़ा न देखा समझिये आप ने लखनऊ को कभी जाना ही नहीं।वैसे तो लखनऊ की कई ख़ास बाते है जो आपको पसन्द आएंगी जैसे बागो का शहर हो या हवाईजहाज नुमा महल या बारादरी या कि केसर में रचा-बसा कैसरबाग या कि हो पुराने लखनऊ में चौक की गलियां या गोमती किनारे का कुड़िया घाट का पुरसुकून मन्ज़र। लखनऊ अपने नाम की ही तरह लाजवाब है। लखनऊ किसी मज़हबी रंग में नही रंगा यहां की जितनी मशहूर प्रकाश की कुल्फ़ी है उतने ही लाजवाब टुंडे के कबाब है। शामीनाशाह की दरगाह हो या कि हो मनकामेश्वरम् मन्दिर। शहर की इन भीड़भाड़ वाली जगहों में भी आपको एक अलग ही सुकून मिलेगा। इसके अलावा दो ऐसी ख़ास बाते हैं जो लखनऊ को दूसरे शहरों से बेहतर और खूबसुरत बनाती हैं। पहला यहाँ त्यौहार की तरह मनाया जाने वाला जेठ का बड़ा मंगल। बड़े मंगल का जश्न पूरे देश में सिर्फ लखनऊ में मनाया जाता है। बड़ा मंगल मनाये जाने के पीछे दो कहानियां प्रचलित है पहला कारण है कि लखनऊ के शाही ख़ानदान में किसी के बीमार होने पर मन्नत मांगी गयी और हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना करके पूजा की गयी जिससे वो बीमार ठीक हो गया। दूसरी कहानी ये है कि एक बार केसर के व्यापारियोंका समूह लखनऊ में था लेकिन उनका केसर महंगा होने की वजह से किसी ने नही लिया वे दुखी हो गए। जब ये बात नवाब साहब को पता चली तो उन्होंने उन व्यापारियों का सारा केसर ख़रीद लिया।नवाब साहब ने सोचा कि इतनी सारी केसर का क्या होगा तब उन्होंने केसर बाग़ के सरे दरवाज़े केसर से रंगवा दिए थे इसी वजह से केसरबाग़ को केसरबाग़ कहा जाता है।और उन व्यापारियों ने खुश होकर इस दिन हनुमान मंदिर के बाहर प्याऊ लगवाया था तभी से जेठ के मंगलवार को हनुमान जी की पूजा के बाद भंडारे का आयोजन होता है। कारण चाहे जो भी हो लेकिन जेठ की इस तपती गर्मी में लखनऊ का कोई भी शख़्स भूखे-प्यासे नही सोता।
इसी तरह से दूसरी ख़ास बात ये है कि शिया मुसलमानों द्वारा मनाया जाने वाला मुहर्रम का त्योहार भी कुछ इस तरह का है। इन दस दिनों में जो शख़्स मजलिस सुनने जाता है उनके खाने-पीने का सारा इंतेज़ाम वही मजलिस में रखा जाता है ।
लखनऊ के लिए ये कहना ग़लत नही होगा कि पहली मुलाक़ात में आपको वो लखनवी अंदाज़ ज़रूर मिल जायेगा। लखनऊ वालो की बात ही सबसे ख़ास है अब नवाब जो ठहरे। उनकी नज़ाकत नफ़ासत की तो दुनिया दीवानी है पर आजकल लोग मोर्डन बनने के चक्कर में अपनी तहज़ीब भूलते जा रहे है तू-तकार से बात करना तक फैशन हो गया है और आप-जनाब तो जहन से निकलता ही जा रहा है। आगे बढ़िये मॉर्डन बनिए मगर अपनी विरासत न भूलिये। वरना वक़्त से पहले ही दुनिया लखनऊ को सिर्फ यूपी की राजधानी के बारे में जानेगी उसकी नज़ाक़त और नफासत के बारे में नही वक़्त हो तो इस पर गौर कीजियेगा।फिर किसी रोज़ मिलेंगे तब तक ले लिए इजाज़त दीजिये।खुदा हाफ़िज़।
Subscribe to:
Comments (Atom)