कभी-कभी कुछ बाते वाक़ई समझ से बाहर होती है। बचपन से लेकर आज तक मैंने यही महसूस किया कि एक लड़की को कभी भी कोई इम्पोर्टेंस नही दी जाती। जब लड़की छोटी होती है तब भी और जब ब्याह कर ससुराल जाती है तब भी। लेकिन ये सब भेदभाव कभी अपने घर में महसूस नही हुआ शायद इसके दो रीजन्स हो सकते है पहला ये कि मेरे घर में लड़कियां नही है या दूसरा ये कि जो भी रूल्स है वो लड़के और लड़कियों दोनों के लिये है। लेकिन ये भेदभाव मैंने अपने आस-पास बहुत देखा है।
जब लड़की छोटी होती है तब उससे ज्यादा एक लड़के को इम्पोर्टेंस मिलती है और अगर सिर्फ बेटियां ही हुई कोई बेटा न होने पर हमेशा उन बेटियों को और उनकी माँ को ही दोष दिया जाता है। अगर घर में लड़का और लड़की दोनों है दोनों की परवरिश तो एक साथ ही की जाती है पर दोनों की परवरिश में बहुत फर्क रखा जाता है। लड़की को हमेशा ये अहसास दिलाया जाता है कि वो इस "आदर्श समाज" का "पराया धन" है जब कि एक लड़के को कभी भी ये अहसास दिलाने की कोई ज़हमत तक नही उठाता कि वो भी इस "आदर्श समाज" का एक ज़िम्मेदार नागरिक है। माँ-बाप का बस नही चलता नही तो वो अपनी लड़की को सर्वगुड संपन्न बना दे इसलिए नही कि वो उससे प्यार करते है या उस पर गर्व कर सके बल्कि सिर्फ इसलिए कि उनकी लड़की लड़के वालो को बस पसंद आजाये।
पेरेंट्स कितना भी अपनी लड़की से करते हो पर वो हमेशा यही कहते है जैसा कल शाम चौधरी उनके मेहता अंकल को बोल रहे थे, "अरे यार! बेटियां अपनी कहाँ है उसे तो एक न एक दिन पराये घर जाना ही है" और उधर ससुराल में लड़की बहु के रूप में ले तो आते है और अपने परिवार का हिस्सा भी बना लेते है उसके नाम से उसका सरनेम हटा कर अपना सरनेम लगा देते है बट जब बात अपने पराये की आती है तो यही ससुराल वाले कहेंगे, "बहु तो पराये घर से आई है तू तो हमारा बेटा था।" हद है........अगर इस आदर्श समाज की सोच के हिसाब से चला जाए तब तो लड़की का कोई घर अपना नही है। न वो जहां उसने जन्म लिया न वो जहां उसकी शादी हुई जिसे उसने सवारने और अपनाने में अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा दी। इस तरह तो उसजे पास कुछ भी नही बचा।
ये आदर्श समाज अगर अपनी सोच से उठकर थोड़ी ख़ुशी एक लड़की को देगा। उसे उसके अपने घर में किसी से भी कमतर ना आकां जाए और ससुराल में भी उसके अस्तित्व की भी क़द्र की जाए तब ही किसी आदर्श समाज को इस देश में देखा जा सकता है वरना तो भगवान भरोसे ही है इस देश की परायी लड़की।
जब लड़की छोटी होती है तब उससे ज्यादा एक लड़के को इम्पोर्टेंस मिलती है और अगर सिर्फ बेटियां ही हुई कोई बेटा न होने पर हमेशा उन बेटियों को और उनकी माँ को ही दोष दिया जाता है। अगर घर में लड़का और लड़की दोनों है दोनों की परवरिश तो एक साथ ही की जाती है पर दोनों की परवरिश में बहुत फर्क रखा जाता है। लड़की को हमेशा ये अहसास दिलाया जाता है कि वो इस "आदर्श समाज" का "पराया धन" है जब कि एक लड़के को कभी भी ये अहसास दिलाने की कोई ज़हमत तक नही उठाता कि वो भी इस "आदर्श समाज" का एक ज़िम्मेदार नागरिक है। माँ-बाप का बस नही चलता नही तो वो अपनी लड़की को सर्वगुड संपन्न बना दे इसलिए नही कि वो उससे प्यार करते है या उस पर गर्व कर सके बल्कि सिर्फ इसलिए कि उनकी लड़की लड़के वालो को बस पसंद आजाये।
पेरेंट्स कितना भी अपनी लड़की से करते हो पर वो हमेशा यही कहते है जैसा कल शाम चौधरी उनके मेहता अंकल को बोल रहे थे, "अरे यार! बेटियां अपनी कहाँ है उसे तो एक न एक दिन पराये घर जाना ही है" और उधर ससुराल में लड़की बहु के रूप में ले तो आते है और अपने परिवार का हिस्सा भी बना लेते है उसके नाम से उसका सरनेम हटा कर अपना सरनेम लगा देते है बट जब बात अपने पराये की आती है तो यही ससुराल वाले कहेंगे, "बहु तो पराये घर से आई है तू तो हमारा बेटा था।" हद है........अगर इस आदर्श समाज की सोच के हिसाब से चला जाए तब तो लड़की का कोई घर अपना नही है। न वो जहां उसने जन्म लिया न वो जहां उसकी शादी हुई जिसे उसने सवारने और अपनाने में अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा दी। इस तरह तो उसजे पास कुछ भी नही बचा।
ये आदर्श समाज अगर अपनी सोच से उठकर थोड़ी ख़ुशी एक लड़की को देगा। उसे उसके अपने घर में किसी से भी कमतर ना आकां जाए और ससुराल में भी उसके अस्तित्व की भी क़द्र की जाए तब ही किसी आदर्श समाज को इस देश में देखा जा सकता है वरना तो भगवान भरोसे ही है इस देश की परायी लड़की।
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