एक नज़्म तुम्हारे लिए....
सोचा था नही सोचूंगी तुम्हे...
एक पल के लिए भी नही याद करूँगी...
तुम्हे भुलाने की कोशिश में...
न जाने कितने काम निपटाये है आज...
बेवजह के कामो को ढूंढा है...
ज़ेहन से निकाल देना चाहती हूँ तुम्हे...
आखिर क्यू आ जाते हो तुम...
मेरी आँखों की खिड़की से...
मेरे दिल के आंगन तक...
दिल से क्यू नही उतर जाते तुम...
जब भी भुलाने की नाक़ाम कोशिश हूँ...
तुम्हारी नज़रे यू देखती है मुझे...
जैसे हँस रही हो मुझ पर...
जैसे कह रही हो...
हु...भुला पाओ अगर तो भूल जाओ...
निकाल पाओ मुझे अपने दिल से...
तो निकाल फेंको बाहर...
मैं इतना मामूली भी नही...
जो यू ही निकाल पाओगी मुझे...
मैं तुम्हारे दिल में किरायदार नही...
मेरा घर है ये...
मैं अपने आंगन में नाचता फिरू...
या चैन की बंसी बजाऊ...
तुम्हे इससे क्या...
मैं भी बहुत ढीट हूँ...
निकाल पाओ गर तो निकाल फेको...
जानता हूं मैं नही निकाल पाओगी...
जिस मज़बूत ज़ेहन की बाते करती हो...
और कहती हो...
कि प्यार नही है तुम्हे मुझसे...
तो खुद को धोखा देती रहो...
जब ज़ेहन थक जाए...
इस कशमकश से...
मन हार मान ले तुम्हारा...
तो कोशिश बन्द कर देना...
क्योंकि न मैं जाने वाला हूं...
और न ही तुम्हारे पास आने वाला हूं...
जानती हूं मैं...
जो तुम घर बना के बैठे हो...
मेरे दिल मे...
तुम्हारे दिल के आंगन में है 'वो'...
जिसके होने से कभी...
कोई फर्क नही पड़ा मुझे...
पर अब जब के नाम जुड़ता है उसका...
तुम्हारे नाम के साथ...
तब दिल चाहता है जला दूँ उस नाम को...
फिर सोचती हूं...
आसानी से तो उसने भी नही पाया तुम्हे...
इसलिए भी शायद...
नही चाहती तुम आओ मेरे पास...
पर क्या करें...
ये इश्क़ है जनाब...
मरते दम तक साथ रहेगा...
फिर भी एक आख़िरी कोशिश चाहती हूं...
भूल जाऊ तुम्हे...
उतर जाओ तुम ज़ेहन से मेरे...
ज़िन्दगी कुछ आसान बन जाये...
--अदिति वर्मा
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