Monday, 20 April 2015

वफ़ा के पाँव जख्मी है......

नारी....एक ऐसा शब्द जिसको कई बार मुख़्तलिफ़ तरह से परिभाषित करने की कोशिश की गयी। कभी रामायण की सती सावित्री सीता के रूप में, कभी महाभारत की कुंती और द्रौपदी, कभी श्याम की राधा या मीरा हो या कि हो सूर की गोपियाँ। सभी ने अपने-अपने हिसाब से नारी को समाज में दिखाया।
एक बात हर किसी की रचना में थी कि एक औरत के जितना प्यारा और वफादार कोई नहीं होता पर कभी-कभी उसका खतरनाक रूप भी इन रचनाओ में देखने को मिला जो कही न कही उस वक़्त के समाज को परिभाषित करता है। देखा जाए तो एक औरत अपनी ज़िन्दगी में कितने सारे रिश्ते निभाती है और सारे के सारे बशर्ते प्यार, विश्वास और वफ़ा पर टिके होते है बचपन में बेटी, बहन, भतीजी, दोस्त फिर एक पत्नी, भाभी, माँ, दादी हो या नानी सारे रिश्तों में बंधकर भी प्यार लुटाती नज़रे होती है।
ये सिर्फ साहित्य या कहानी में पकाया ख्याली पुलाव नहीं है बल्कि एक सच्चाई है। इस पुरुष प्रधान समाज में एक औरत के लिए तथा कथित परिवार जैसी चीज़ पर अपना सब कुछ लुटाती है जबकि वो परिवार उसे न तो प्यार देता है न सम्मान देता है। बल्कि बदले में उसे मिलती है केवल हार घृणा, अत्याचार और कई अनकहे ज़ुल्म। कितना भी वो प्यार लुटाए.....वफ़ा करे...पर क़िस्मत में आएगी सिर्फ अग्निपरीक्षा....किसी ने बिल्कुल सही कहा है......
"जब से सीता गुज़री आग से
तब से वफ़ा के पाँव जख्मी है "

Sunday, 12 April 2015

ये जो बेमौसम की बरसात है....

ये जो बेमौसम की बरसात है....
किसी के लिए ख़ुशी किसी के लिए रात है....
मोहब्बत में डूबे शख्श के लिए....
रूमानी खुमार है....
हिज्र से मुख़ातिब शख्श के लिए....
यादो की खूबसूरत महफ़िल है....
वो यादें जो एक रोज़ गुज़ारी थी....
वो बाते जो एक शाम का हिस्सा थी.....
एक अल्हड़ सी लड़की के लिए.....
मिट्टी की खूश्बू थी बारिश....
एक दीवाने से लड़के की खातिर....
उसकी दिलरुबा थी बारिश...
चेहरे पर पड़ती बूंदों का....
अहसास था अनोखा सा....
पर सबके लिए ये खूबसूरत न था....
इस धरती को सवांरने वाले....
देवताओं के लिए था बुरा ख़्वाब....
इसी बारिश ने जहाँ एक तरफ....
किसी को अपनो की याद दिलाई....
तो इन किसानो के लिए ले आई मौत का इंतज़ाम...
किसी के लिए बहार लायी....
और इन बेचारो के लिए तबाही का सैलाब....
कितनो ने चाहा कि ये बरसात....
यूँ ही बरसती रहे....
और कितनो ने मांगी मन्नते....
ये बरसात यही थम जाए....
बारिश के साथ पड़ते ओलो ने....
कितनो को ठण्ड का रूमानी अहसास कराया....
और कितनो को आने वाले संकट.....
ग़रीबी, बेचारगी का अहसास कराया...
कितनो ने आने वाली ज़िन्दगी के....
सपने संजोये...सवाँरे...
और कितनो ने अपनी ज़िन्दगी.....
को ख़त्म किया...
कितनो ने जशन मनाया इस मौसम का....
पर कईयो ने मातम मनाया....
इस बेमौसम बरसात का....
ये जो बेमौसम की बरसात है...
किसी के लिए ख़ुशी किसी के लिए रात है.....

तू मेरा हमसफर है

हम है ग़म है...
ग़म ही हमसफ़र है.....
अब सब है और मैं हूँ....
सब मतलब के साथी है.....
बस आगे बढ़ते जाना है......
मन्ज़िल को बस पाना है......
जितने ग़म है उतनी मैं हूँ......
मैं...उलझन...मरहला....
सब है मेरे ही रूप.....
या कहू के सब है मुझमें.....
इबादत..परिश्तिष्....अल्लाह....
सब है उसके ही रूप.....
मैं हूँ अदना सी शख़्सियत.....
तेरे आगे क्या बिसात मेरी हैं....
तुझसे ही मैं हूँ.....
मेरा वजूद मेरा ग़म  हैं.....
और मेरा ग़म ही मेरा हमसफ़र हैं...
तू अल्लाह है तू ईश्वर है...
तू ही मेरा कृष्णा है......
तू दोस्त मेरा हमनवा मेरा....
अब मैं हूँ तू हैं......
और तू ही मेरा हमसफ़र हैं......

Wednesday, 8 April 2015

मुख़्तलिफ़ है चॉक की दास्ताँ.....

चॉक......एक ऐसा शब्द जिसे शायद ही कोई ना जानता हो। चॉक जो छोटे बच्चों के लिए लिखने का जरिया है टीचर्स के लिए समझाने का तरीका। चॉक को तरह-तरह के लोग अपने-अपने हिसाब से समझते है।
पहले बात करते है उसके रंग पर...पहले चॉक जब सिर्फ सफ़ेद रंग की होती थी। सफ़ेद रंगत ब्लैकबोर्ड पर लिखी जाती है तो साफ़-साफ़ दिखता है। ब्लैक जो की हमेशा से बुराई का प्रतीक माना गया और सफ़ेद जो हमेशा सच्चाई और अच्छाई का सिंबल माना गया यानी कोई चीज कितनी भी बुरी हो उसे अच्छाई से अच्छा और बेहतर किया जा सकता है। एक नज़रिया ये था तो दूसरा नज़रिया ये है क़ि अगर हमारी ज़िन्दगी चॉक और डस्टर जैसी होती तो कितनी अच्छा होता। चॉक की तरह ही ज़िन्दगी भी हमें बहुत से हादसों से, खुशियो से, ग़लतियो से, अच्छाई से और बहुत सी बातो से नवाज़ती जाती है और जो चीज़े हमें पसंद न होती, जिन्हें हम भूल जाना चाहते अपनी ज़िन्दगी से उनका नाम-ओ-निशाँ मिटा देना चाहते है अगर हमारी ज़िन्दगी में डस्टर जैसी कोई चीज़ होती तो हम अपनी ज़िन्दगी से सारे बुरे हादसे मिटा देते और चॉक की मदद से अच्छे खूबसूरत यादें जोड़ लेते। अगर ऐसा होता तो कितना अच्छा होता।
ख़ैर नज़रिये की बात तो सब करते है पर आज हम याद करेंगे कुछ पुराने ख़ास पलो को जो पूरी तरह से चॉक से जुड़े होंगे। सबसे पहले बात करते है एक टीचर की। एक टीचर की लाइफ में चॉक की बड़ा इम्पोर्टेन्ट रोल होता है। हालांकि जबकि मार्कर्स वज़ूद में आये है तब से चॉक की इम्पोर्टेंस कम हो गयी है। पर टीचर्स की कई तरह की यादें चॉक से जुड़ी है मसलन चॉक ख़त्म हो जाने पर दूसरे क्लास से चॉक मंगाना या फिर जब चल रही हो एक इंटरेस्टिंग क्लास और टीचर को दिख जाये नींद में एक स्टूडेंट, फिर क्या उसकी तो शामत समझो और हाथ में पकड़ा चॉक का एक टुकड़ा उस बेचारे नींद से मज़बूर लड़के के सर से टकराया और वो हड़बड़ा के उठ बैठा अब तो क्लास लगने की बारी उसकी। ये तो हुई एक टीचर की बात पर बच्चे  तो इसके बारे में उलट ही सोचते है वो चॉक को सिर्फ पढाई तक ही सीमित नहीं रखते है। छोटी क्लास में पढ़ने वाले बच्चे चॉक से कुछ सीखते है उनसे थोड़े बड़े बच्चे ब्लैकबोर्ड को चॉक से रंगते भी है। कुछ महारथी चॉक को चखने से भी नहीं चूकते है इसीलिए वो स्कूल से चॉक चुरा भी ले जाते है तो कभी-कभी चॉक को घिस-घिस कर उसका बुरादा बनाकर अपने दोस्तों को रंगने की कोशिश भी करते है। कुछ क्रिएटिव और कलाकार लोगो के लिए सफ़ेद चॉक से लेकर रंग-बिरंगी चॉक तक, उन सब को मिलाकर खूबसूरत पेंटिंग तक बना देते है। उन कलाकार लोगो में से कुछ लोग चॉक से सड़को पर चौराहो पर ऐसी पेंटिंग बनाते है कि देखने वाले देखते रह जाए ऐसे कई पेंटर देश-विदेश में है।
 अब बात करे लोकल सड़कछाप महान पैंटर्स की..इन्हें पेंटर कहना ही पेंटर का अपमान होगा पर हा इन्हें सड़कछाप आशिक़ या रोमियो कहना ज्यादा मुनासिब होगा क्योंकि ये कुछ ऐसे लोग जो सड़को पर, लोगो की घरो की दीवारो पर, यहाँ तक की पेड़ो पर और हिस्टोरिकल जगहों पर चॉक से बड़ा सा दिल बनाएंगे और उसमे तीर भी बनाएंगे फिर अपना और अपनी बेग़म का नाम लिखेंगे दुनिया को अपनी मोहब्बत का सबूत देंगे की उ से बड़ा तीसमारखां कोई नहीं है। एक महज़ चॉक से दीवार पर अपना नाम लिखकर खुद को तसल्ली देते है वो ताजमहल नहीं बनवा सकते तो क्या हुआ उसमे नाम लिखकर ही जग जाहिर कर दे। हे चॉक तू किन-किन लोगो के काम आती है और सबके काम बनाती है वाह रे चॉक तेरी महिमा अपरम्पार है।