Wednesday, 21 October 2015

परायी लड़की

कभी-कभी कुछ बाते वाक़ई समझ से बाहर होती है। बचपन से लेकर आज तक मैंने यही महसूस किया कि एक लड़की को कभी भी कोई इम्पोर्टेंस नही दी जाती। जब लड़की छोटी होती है तब भी और जब ब्याह कर ससुराल जाती है तब भी। लेकिन ये सब भेदभाव कभी अपने घर में महसूस नही हुआ शायद इसके दो रीजन्स हो सकते है पहला ये कि मेरे घर में लड़कियां नही है या दूसरा ये कि जो भी रूल्स है वो लड़के और लड़कियों दोनों के लिये है। लेकिन ये भेदभाव मैंने अपने आस-पास बहुत देखा है।
जब लड़की छोटी होती है तब उससे ज्यादा एक लड़के को इम्पोर्टेंस मिलती है और अगर सिर्फ बेटियां ही हुई कोई बेटा न होने पर हमेशा उन बेटियों को और उनकी माँ को ही दोष दिया जाता है। अगर घर में लड़का और लड़की दोनों है दोनों की परवरिश तो एक साथ ही की जाती है पर दोनों की परवरिश में बहुत फर्क रखा जाता है। लड़की को हमेशा ये अहसास दिलाया जाता है कि वो इस "आदर्श समाज" का "पराया धन" है जब कि एक लड़के को कभी भी ये अहसास दिलाने की कोई ज़हमत तक नही उठाता कि वो भी इस "आदर्श समाज" का एक ज़िम्मेदार नागरिक है। माँ-बाप का बस नही चलता नही तो वो अपनी लड़की को सर्वगुड संपन्न बना दे इसलिए नही कि वो उससे प्यार करते है या उस पर गर्व कर सके बल्कि सिर्फ इसलिए कि उनकी लड़की लड़के वालो को बस पसंद आजाये।
पेरेंट्स कितना भी अपनी लड़की से करते हो पर वो हमेशा यही कहते है जैसा कल शाम चौधरी उनके मेहता अंकल को बोल रहे थे, "अरे यार! बेटियां अपनी कहाँ है उसे तो एक न एक दिन पराये घर जाना ही है" और उधर ससुराल में लड़की बहु के रूप में ले तो आते है और अपने परिवार का हिस्सा भी बना लेते है उसके नाम से उसका सरनेम हटा कर अपना सरनेम लगा देते है बट जब बात अपने पराये की आती है तो यही ससुराल वाले कहेंगे, "बहु तो पराये घर से आई है तू तो हमारा बेटा था।" हद है........अगर इस आदर्श समाज की सोच के हिसाब से चला जाए तब तो लड़की का कोई घर अपना नही है। न वो जहां उसने जन्म लिया न वो जहां उसकी शादी हुई जिसे उसने सवारने और अपनाने में अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा दी। इस तरह तो उसजे पास कुछ भी नही बचा।
ये आदर्श समाज अगर अपनी सोच से उठकर थोड़ी ख़ुशी एक लड़की को देगा। उसे उसके अपने घर में किसी से भी कमतर ना आकां जाए और ससुराल में भी उसके अस्तित्व की भी क़द्र की जाए तब ही किसी आदर्श समाज को इस देश में देखा जा सकता है वरना तो भगवान भरोसे ही है इस देश की परायी लड़की।

Thursday, 11 June 2015

ख़ूबसूरत सफ़र

कभी-कभी सफ़र करना कितना खूबसूरत लगता है। ख़ासकर तब जब सफ़र के दौरान आप अपने ख़्यालो और किताबों में न खोकर अपने आस-पास होने वाले वाक़यो पर ध्यान देते है। मैं आपसे अपने आज के सफ़र में हुए ऐसे ही कुछ रोचक वाक़यो के बारे में बताने वाली हूँ।
बुसस्टॉप पर बस रुकने पर मैं और मेरी दोस्त दोनों ही बस में चढ़े। बस में ही चढ़ते ही हमने देखा कि हमारे बैठने के लिये बस में जगह नही थी महिला सीट पर भी ज्यादातर पुरुष जाति ही विराजमान थी। हमने मन में सोचा कि आज सीट नही मिलेगी। तभी एक सज्जन पुरुष अपनी जगह से उठ गए और हमारी दोस्त से बैठने को कहा। उनकी देखादेखी एक और लड़का अपनी जगह से उठ गया और मुझे बैठने को कहा। हम दोनों ही हैरान थे क्योंकि आमतौर पर ऐसा नही होता खासकर तब एक लड़का उठ जाए जब कि एक लड़की खड़ी है सिर्फ इसलिए।
बस के आगे बढ़ते ही हमने मेट्रो के ढीले-ढाले विकास को देखा। आगे जाकर एक जगह बस रुकी और टिकट चेकिंग शुरू हुई। एक बुजुर्ग औरत थोड़ी देर पहले चढ़ी थी और उसके पास टिकट नही था जिसके कारण उसे काफी डांट पड़ी। बस हमें हमारी मंज़िल पे छोड़कर आगे बढ़ गयी। ऐसे ही किसी आम से दिन के सफ़र से आप भी हमे रूबरू करवाये। आगे ऐसे ही किसी सफ़र में फिर से मुलाक़ात होगी। तब तक लिये खुदाहाफिज़।

Monday, 20 April 2015

वफ़ा के पाँव जख्मी है......

नारी....एक ऐसा शब्द जिसको कई बार मुख़्तलिफ़ तरह से परिभाषित करने की कोशिश की गयी। कभी रामायण की सती सावित्री सीता के रूप में, कभी महाभारत की कुंती और द्रौपदी, कभी श्याम की राधा या मीरा हो या कि हो सूर की गोपियाँ। सभी ने अपने-अपने हिसाब से नारी को समाज में दिखाया।
एक बात हर किसी की रचना में थी कि एक औरत के जितना प्यारा और वफादार कोई नहीं होता पर कभी-कभी उसका खतरनाक रूप भी इन रचनाओ में देखने को मिला जो कही न कही उस वक़्त के समाज को परिभाषित करता है। देखा जाए तो एक औरत अपनी ज़िन्दगी में कितने सारे रिश्ते निभाती है और सारे के सारे बशर्ते प्यार, विश्वास और वफ़ा पर टिके होते है बचपन में बेटी, बहन, भतीजी, दोस्त फिर एक पत्नी, भाभी, माँ, दादी हो या नानी सारे रिश्तों में बंधकर भी प्यार लुटाती नज़रे होती है।
ये सिर्फ साहित्य या कहानी में पकाया ख्याली पुलाव नहीं है बल्कि एक सच्चाई है। इस पुरुष प्रधान समाज में एक औरत के लिए तथा कथित परिवार जैसी चीज़ पर अपना सब कुछ लुटाती है जबकि वो परिवार उसे न तो प्यार देता है न सम्मान देता है। बल्कि बदले में उसे मिलती है केवल हार घृणा, अत्याचार और कई अनकहे ज़ुल्म। कितना भी वो प्यार लुटाए.....वफ़ा करे...पर क़िस्मत में आएगी सिर्फ अग्निपरीक्षा....किसी ने बिल्कुल सही कहा है......
"जब से सीता गुज़री आग से
तब से वफ़ा के पाँव जख्मी है "

Sunday, 12 April 2015

ये जो बेमौसम की बरसात है....

ये जो बेमौसम की बरसात है....
किसी के लिए ख़ुशी किसी के लिए रात है....
मोहब्बत में डूबे शख्श के लिए....
रूमानी खुमार है....
हिज्र से मुख़ातिब शख्श के लिए....
यादो की खूबसूरत महफ़िल है....
वो यादें जो एक रोज़ गुज़ारी थी....
वो बाते जो एक शाम का हिस्सा थी.....
एक अल्हड़ सी लड़की के लिए.....
मिट्टी की खूश्बू थी बारिश....
एक दीवाने से लड़के की खातिर....
उसकी दिलरुबा थी बारिश...
चेहरे पर पड़ती बूंदों का....
अहसास था अनोखा सा....
पर सबके लिए ये खूबसूरत न था....
इस धरती को सवांरने वाले....
देवताओं के लिए था बुरा ख़्वाब....
इसी बारिश ने जहाँ एक तरफ....
किसी को अपनो की याद दिलाई....
तो इन किसानो के लिए ले आई मौत का इंतज़ाम...
किसी के लिए बहार लायी....
और इन बेचारो के लिए तबाही का सैलाब....
कितनो ने चाहा कि ये बरसात....
यूँ ही बरसती रहे....
और कितनो ने मांगी मन्नते....
ये बरसात यही थम जाए....
बारिश के साथ पड़ते ओलो ने....
कितनो को ठण्ड का रूमानी अहसास कराया....
और कितनो को आने वाले संकट.....
ग़रीबी, बेचारगी का अहसास कराया...
कितनो ने आने वाली ज़िन्दगी के....
सपने संजोये...सवाँरे...
और कितनो ने अपनी ज़िन्दगी.....
को ख़त्म किया...
कितनो ने जशन मनाया इस मौसम का....
पर कईयो ने मातम मनाया....
इस बेमौसम बरसात का....
ये जो बेमौसम की बरसात है...
किसी के लिए ख़ुशी किसी के लिए रात है.....

तू मेरा हमसफर है

हम है ग़म है...
ग़म ही हमसफ़र है.....
अब सब है और मैं हूँ....
सब मतलब के साथी है.....
बस आगे बढ़ते जाना है......
मन्ज़िल को बस पाना है......
जितने ग़म है उतनी मैं हूँ......
मैं...उलझन...मरहला....
सब है मेरे ही रूप.....
या कहू के सब है मुझमें.....
इबादत..परिश्तिष्....अल्लाह....
सब है उसके ही रूप.....
मैं हूँ अदना सी शख़्सियत.....
तेरे आगे क्या बिसात मेरी हैं....
तुझसे ही मैं हूँ.....
मेरा वजूद मेरा ग़म  हैं.....
और मेरा ग़म ही मेरा हमसफ़र हैं...
तू अल्लाह है तू ईश्वर है...
तू ही मेरा कृष्णा है......
तू दोस्त मेरा हमनवा मेरा....
अब मैं हूँ तू हैं......
और तू ही मेरा हमसफ़र हैं......

Wednesday, 8 April 2015

मुख़्तलिफ़ है चॉक की दास्ताँ.....

चॉक......एक ऐसा शब्द जिसे शायद ही कोई ना जानता हो। चॉक जो छोटे बच्चों के लिए लिखने का जरिया है टीचर्स के लिए समझाने का तरीका। चॉक को तरह-तरह के लोग अपने-अपने हिसाब से समझते है।
पहले बात करते है उसके रंग पर...पहले चॉक जब सिर्फ सफ़ेद रंग की होती थी। सफ़ेद रंगत ब्लैकबोर्ड पर लिखी जाती है तो साफ़-साफ़ दिखता है। ब्लैक जो की हमेशा से बुराई का प्रतीक माना गया और सफ़ेद जो हमेशा सच्चाई और अच्छाई का सिंबल माना गया यानी कोई चीज कितनी भी बुरी हो उसे अच्छाई से अच्छा और बेहतर किया जा सकता है। एक नज़रिया ये था तो दूसरा नज़रिया ये है क़ि अगर हमारी ज़िन्दगी चॉक और डस्टर जैसी होती तो कितनी अच्छा होता। चॉक की तरह ही ज़िन्दगी भी हमें बहुत से हादसों से, खुशियो से, ग़लतियो से, अच्छाई से और बहुत सी बातो से नवाज़ती जाती है और जो चीज़े हमें पसंद न होती, जिन्हें हम भूल जाना चाहते अपनी ज़िन्दगी से उनका नाम-ओ-निशाँ मिटा देना चाहते है अगर हमारी ज़िन्दगी में डस्टर जैसी कोई चीज़ होती तो हम अपनी ज़िन्दगी से सारे बुरे हादसे मिटा देते और चॉक की मदद से अच्छे खूबसूरत यादें जोड़ लेते। अगर ऐसा होता तो कितना अच्छा होता।
ख़ैर नज़रिये की बात तो सब करते है पर आज हम याद करेंगे कुछ पुराने ख़ास पलो को जो पूरी तरह से चॉक से जुड़े होंगे। सबसे पहले बात करते है एक टीचर की। एक टीचर की लाइफ में चॉक की बड़ा इम्पोर्टेन्ट रोल होता है। हालांकि जबकि मार्कर्स वज़ूद में आये है तब से चॉक की इम्पोर्टेंस कम हो गयी है। पर टीचर्स की कई तरह की यादें चॉक से जुड़ी है मसलन चॉक ख़त्म हो जाने पर दूसरे क्लास से चॉक मंगाना या फिर जब चल रही हो एक इंटरेस्टिंग क्लास और टीचर को दिख जाये नींद में एक स्टूडेंट, फिर क्या उसकी तो शामत समझो और हाथ में पकड़ा चॉक का एक टुकड़ा उस बेचारे नींद से मज़बूर लड़के के सर से टकराया और वो हड़बड़ा के उठ बैठा अब तो क्लास लगने की बारी उसकी। ये तो हुई एक टीचर की बात पर बच्चे  तो इसके बारे में उलट ही सोचते है वो चॉक को सिर्फ पढाई तक ही सीमित नहीं रखते है। छोटी क्लास में पढ़ने वाले बच्चे चॉक से कुछ सीखते है उनसे थोड़े बड़े बच्चे ब्लैकबोर्ड को चॉक से रंगते भी है। कुछ महारथी चॉक को चखने से भी नहीं चूकते है इसीलिए वो स्कूल से चॉक चुरा भी ले जाते है तो कभी-कभी चॉक को घिस-घिस कर उसका बुरादा बनाकर अपने दोस्तों को रंगने की कोशिश भी करते है। कुछ क्रिएटिव और कलाकार लोगो के लिए सफ़ेद चॉक से लेकर रंग-बिरंगी चॉक तक, उन सब को मिलाकर खूबसूरत पेंटिंग तक बना देते है। उन कलाकार लोगो में से कुछ लोग चॉक से सड़को पर चौराहो पर ऐसी पेंटिंग बनाते है कि देखने वाले देखते रह जाए ऐसे कई पेंटर देश-विदेश में है।
 अब बात करे लोकल सड़कछाप महान पैंटर्स की..इन्हें पेंटर कहना ही पेंटर का अपमान होगा पर हा इन्हें सड़कछाप आशिक़ या रोमियो कहना ज्यादा मुनासिब होगा क्योंकि ये कुछ ऐसे लोग जो सड़को पर, लोगो की घरो की दीवारो पर, यहाँ तक की पेड़ो पर और हिस्टोरिकल जगहों पर चॉक से बड़ा सा दिल बनाएंगे और उसमे तीर भी बनाएंगे फिर अपना और अपनी बेग़म का नाम लिखेंगे दुनिया को अपनी मोहब्बत का सबूत देंगे की उ से बड़ा तीसमारखां कोई नहीं है। एक महज़ चॉक से दीवार पर अपना नाम लिखकर खुद को तसल्ली देते है वो ताजमहल नहीं बनवा सकते तो क्या हुआ उसमे नाम लिखकर ही जग जाहिर कर दे। हे चॉक तू किन-किन लोगो के काम आती है और सबके काम बनाती है वाह रे चॉक तेरी महिमा अपरम्पार है।

Sunday, 8 March 2015

"मेरे छोटे-छोटे ख़्वाब है......."

पत्रकारिता के क्षेत्र में एक मशहूर पत्रकार बनने की चाह रखने वाली और अपने ख़्वाबो को हक़ीक़त से रूबरू कराने का हौसला रखने वाली "चारु प्रियम्" से "आर.जे. अदिति वर्मा" की बात-चीत के कुछ अंश:
Q- आपने अपनी पढाई कहाँ से की?
A- मैं बिहार की हूँ तो मेरी स्कूलिंग भी वही के एक स्कूल ज्ञान केंद्र से हुई फिर मैं यू.पी. आ गयी और फिर यही रहकर आगे की पढाई की और कर रही हूँ।
Q- आपका यू.पी. आना कैसे हुआ?
A- मेरे पेरेंट्स चाहते थे कि मैं आगे की पढाई लखनऊ से करू क्योंकि उन्हें नवाबो का ये शहर बहुत पसंद है। इस शहर की तहज़ीब,नज़ाकत, नफ़ासत, ज़बान हर चीज़ बेहतरीन है। इसीलिए मैने आगे की पढाई भी एल.यू. से जारी रखी।
Q- आपको यहाँ रहते कितना वक़्त हो चूका है?
A- लगभग सात साल।
Q- यू.पी. आपको कैसा लगा?
A- बिहार की तरह ही। अच्छे बुरे लोग तो हर जगह होते है।
Q- आपको कैसी फ़िल्मे पसंद है और किसी एक फ़िल्म का नाम?
A- मुझे कॉमेडी फ़िल्मे बहुत पसंद है क्योंकि मुझे हँसना और हँसाना बहुत अच्छा लगता है। मेरी फेवरिट फ़िल्म 'रन' है।
Q- आपको किन-किन चीज़ो का शौक़ है?
A- मुझे मस्त होकर डांस करना गेम्स खेलना और गाने गाना बहुत पसंद है।
Q- कोई फेवरिट सॉन्ग?
A- तेरी गलियां गलियां तेरी गलियां मुझको भावे तेरी गलियां.......।
Q- आप लाइफ में क्या बनना चाहती हो?
A- मैं फेमस जनरलिस्ट बनना चाहती हूँ।
Q- इसके अलावा कोई ख़्वाब जो आप पूरा करना चाहती हो???
A- हां है ना......ढेर सारे ख़्वाब है मेरे....पहला मैं अपनी माँ और पापा जी के लिए एक बहुत प्यारा घर बनवाना चाहती हूँ दूसरा अपने नाना जी के नाम से एक अनाथालय बनवाना चाहती हूँ और सारी दुनिया में मनमाफिक अपना राज चाहती हूँ (हँसते हुए)।
Q- आपकी लाइफ में सबसे इम्पॉर्टेन्ट कौन है?
A- मम्मा मेरी ज़िन्दगी है उनसे  ही मेरी ज़िन्दगी शुरू हो के उन्ही पे ख़त्म है। इसके अलावा मेरी रूबी दी है जो कि मेरी बेस्ट फ्रेंड भी है।
Q- खाली वक़्त में क्या करना पसंद करती है?
A- मुझे शॉपिंग बहुत पसंद है, फुरसत में मैं सोती भी बहुत हूँ। दोस्तों से बाते करना भी पसंद है और सबसे जरुरी किसी की हेल्प करना बहुत है।
Q- आप अपनी लाइफ में सबसे अच्छा क्या चाहती है?
A- मैं सफलता के शिखर को पाना चाहती हूँ ताकि लोग मुझे मेरे नाम से जाने मेरे सरनेम से नहीं।
Q- आपकी लाइफ में आप सबसे ज्यादा नफ़रत किसे करती है? और क्यों?
A- मुझे हर उस इंसान से चिढ होती है जो खुदगर्ज़ होता है और शायद इसीलिए मुझे अपनी आंटी से बहुत नफ़रत महसूस होती है और जब भी मन  का काम न हो तब भी मुझे अच्छा नहीं लगता है।
Q- आपको खाने में क्या पसंद है?
A- मैगी, चॉकलेट, कॉल्डकॉफी के लिए मैं कभी मना नहीं करती हूँ।
Q- फेवरेट एक्टर और एक्ट्रेस?
A- करीना कपूर, प्रीती ज़िन्टा & ह्रितिक रोशन
Q- आपका फर्स्ट लव कौन है?
A- फिलहाल कोई नहीं पर मैं चाहती हूँ कि मेरे हस्बैंड नैतिक जैसा हो ("ये रिश्ता क्या कहलाता है" का लीड एक्टर)
Q- क्या-क्या खूबियां चाहती है आप उसमें?
A- वो मुझे समझे मेरी बातों को कहे बिना ही जान ले। मेरी फीलिंग्स की क़द्र करे।
Q- मोहब्बत आपकी नज़र में क्या है?
A- लव इज़ लाइफ और मैं अपनी मॉम से बहुत प्यार करती हूँ। आई लव यू मम्मा....
Q- अपनी लाइफ में इम्पोर्टेन्ट लोगो के लिये कोई सांग?
A- माँ-पापा के लिए- मुझे माफ़ करना ओ साई राम.....
दोस्तों के लिये- हर एक फ्रेंड कमीना होता है.....(हँसते हुए)
Q- आपकी लाइफ का बेस्ट मोमेंट?
A- जब भी मैं अपनी मम्मा से बात करती हूँ और वो वाक़या जो मेरी दोस्त के साथ हुआ था।
Q- दोस्ती आपकी नज़र में क्या है?
A- दोस्ती.....दुनिया का वो रिश्ता है जिसे हम खुद चुनते है और अपने हिसाब से निभाते है दोस्ती को परिभाषित नहीं कर सकते है। आई थिंक जिसका इस दुनिया में कोई दोस्त नहीं तो वो खुद का भी नहीं हो सकता है।
Q- आगे की लाइफ को लेकर क्या प्लान है?
A- फिलहाल तो एक जनरलिस्ट बनना है।
Q- आपको राजनीति में इंटरेस्ट है?
A- कुछ ख़ास नहीं। पर जब हमारे न्यूज़ चैनेल ज्यादातर यही दिखाएंगे तो देखना ही पड़ता है।
Q- सोशल नेटवर्किंग साइट्स के बारे में आपका क्या ख़्याल है कुछ कहना चाहेंगी?
A- सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफॉर्म है। जहाँ पर हर शख़्स अपनी राय रख सकता है। जिसमे लोग बेझिझक हर बात शेयर कर सकते है। किसी के खिलाफ बोल सकते है। किसी को आसमान में पंहुचा सकते है अपनी पसंदीदा हस्ती से आप रूबरू हो सकते है। पर कही-कही इसमें नुकसान भी है जैसे कुछ ग़ैर फितरती लोग इसका ग़लत यूज़ कर रहे है।
Q- जैसे?
A- जैसे आई.एस. या इस तरह के ही कुछ ख़ास आतंकी संगठन। जिन्होंने इसे ही अपना ज़रिया या यूँ कहे कि एक बेहतर हथियार बना लिया है। और इस्लाम के नाम सब जायज़ करते चले जाते है। दरिंदगी की हद पार करते चले जाते है। (गुस्से में)
Q- आप कुछ बताना चाहेंगी कि कैसे इसे रोका जा सकता है?
A- सिर्फ दो तरीके है उन्हें रोकने के या तो एक तरफ से सबको ख़त्म कर दो हर उस शख़्स को जो धर्म की ओट में हिंसा करे या दूसरा रास्ता अहिंसा का इख़्तियार करो।
Q- आपको सबसे ज्यादा बुरा इस देश में क्या लगता है?
A- ईव टीज़िंग। जो इस देश में ही नहीं पूरी दुनिया में है। इस वजह से कोई लड़की कितना बुरा फील कर सकती है कोई समझ नहीं सकता है।। इसके बाद इस देश में लड़कियो की क़द्र है नहीं जबकि लड़की बरक़त है दुनिया में। लेकिन क्या करे ये इस देश का दुर्भाग्य है कि वो कद्र नहीं करते।
Q- लगता है आप बहुत हर्ट हुई है?
A- बिल्कुल! एक लड़की होते हुए भी ये सब न समझ सकूँ तो लानत है मुझ पर।
Q- आप युथ को कोई सन्देश देना चाहेंगी?
A- सन्देश.... मैं कहना चाहूंगी कि यूथ सपने देखे और उन्हें पूरा करने का हौसला रखे हिम्मत रखे पर हक़ीक़त से कभी मुँह न चुराए। हकीक़त को सामने  रखकर ख़्वाबो को पूरा करने का हौसला रखे। अगर कभी नाकामयाब हो भी जाए तो उससे निराश न होकर आगे बढे। क्योंकि सफलता की पहली सीढ़ी असफलता से शुरू होती है। अपनी थिंकिंग पॉजिटिव रखे और अपने बड़ो के लिए दिल में इज़्ज़त और मोहब्बत रखे।

Tuesday, 24 February 2015

दहेज़

दो दिन पहले एक आदमी ने अपनी पत्नी को ज़िंदा जला दिया जब कि उसकी पत्नी एक बच्चे को जन्म देने वाली थी। उसे जलाया गया सिर्फ इसलिए कि वो अपने साथ दहेज़ लेकर नहीं आई थी। इसी तरह एक लड़की ने अपनी शादी के दस दिन बाद खुदखुशी कर ली क्योंकि ये शादी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ थी और साथ ही उसका पति दहेज़ को लेकर ताने देने वाला और शक्की नेचर का था। अपने पति के दहेज़ को लेकर और शादी के पहले की ज़िन्दगी को लेकर ताने मारने की वजह से उसने खुदखुशी कर ली।
समझ नहीं आता के लोग इतनी छोटी सोच के कैसे हो सकते है। एक पति जिसने एक लड़की के साथ फेरे लिए, सात वचन लिए और वो लड़की सिर्फ उस लड़के के साथ एक रिश्ते में बंध कर उसके भरोसे पर अपने घर को छोड़ कर आई अपनों को छोड़ कर आई जिस आँगन में वो पलती है बड़ी होती है पर शादी के बाद वही घर उसके लिए गैर का हो जाता है। यकीं नहीं होता कि एक पति जो खुद किसी का बेटा है अपनी पत्नी को जो माँ बनने वाली है आग के हवाले कर देता है और खबर ये फैलाता है कि सिलेंडेर ब्लास्ट हो गया। वही एक और पति खुद चाहे शादी से पहले कितने घाट घुमे हो पर पत्नी उन्हें सीता जैसी चाहिए।
दहेज़ के मामले में ये लोग अपाहिज होते है खुद से कुछ कर ही नहीं सकते तो दहेज़ लाने के लिए अपनी पत्नियो को परेशान करते है।
पता नहीं इस देश में ऐसा कब होगा कि कम से कम दहेज़ को लेकर इस तरह की हत्ताये और आत्महत्ताये ख़त्म हो जाएँगी।

Thursday, 12 February 2015

first blog

Good afternoon........
This is my first post....
Making of the blog I am so happy......